टेराकोटा पाटरी शिल्प कला को आगे बढ़ा रहे है पश्चिम बंगाल के कलाकार

 

रायपुर।अनेक कलाओं का घर, भारत देश के लगभग हर राज्य में एक अलग कला और परंपरा देखने को मिलती है। एक ऐसी ही पारंपरिक कला के लिए जाना जाता है पश्चिम बंगाल का पंचमुरा गांव, जो टेराकोटा पॉटरी के लिए विश्व प्रसिद्ध है। बंगाल का टेराकोटा शिल्प उतना ही पुराना है जितना कि बांकुरा, मुर्शिदाबाद, बिष्णुपुर के विभिन्न हिस्सों में बनाए गए टेराकोटा मंदिर हैं।
टेराकोटा की जड़ें 8वीं शताब्दी के मल्ल वंश के समय में मिलती है। 17वीं शताब्दी में यह कला अपने चरम पर थी जब राजा जगत मल्ल और उनके वंशजों ने दीवारों पर टेराकोटा नक्काशी के साथ मंदिरों का निर्माण किया।
पंचमुरा गाँव के हर घर में कम से कम एक टेराकोटा कलाकार मिलता है और यहाँ के लगभग 70 परिवार इस सदियों पुरानी ‘कुंभकार’ परंपरा को आगे बढ़ाते हुए टेराकोटा कला को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं। गाँव में एक बड़ा सा कुंआ बनाया गया है जहाँ सभी कारीगरों द्वारा बनाई गई टेराकोटा वस्तुओं को आग में पकाने का काम किया जाता है।
आज इस गाँव में की गईं टेराकोटा रचनाएं पूरे भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी पसंद की जाती हैं। ‘बांकुरा घोड़ा’ और ‘बोंगा हाँथी’ इस गाँव की विशेष पहचान हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *